Friday, October 3, 2014

भगवद्गीता तो एक ही है







भगवद्गीता तो एक ही है
    देखा जाए तो गीता एक विशिष्ट मार्ग पर चलवाने वाली एक निर्देशिका है। मूलतः यह श्री ष्ण द्वारा युद्ध में अर्जुन को कहे गए उपदेश स्वरुप श्लोक हैं। यह उपदेश प्रत्येक धर्म-संप्रदायों के अनुयायियों का उचित मार्गदर्शन करते हैं। प्रसिद्ध दार्शनिक एल्डुअस हक्सले मानते हैं कि गीता शाश्वत दर्शन का निरुपण करने वाले सभी ग्रथों में संपूर्ण है। यह न केवल भारतीयों के लिए बल्कि सभी धर्म-सम्प्रदाओं के अनुयायियों के लिए उपयोगी और स्थायी मूल्य रखता है।  
विद्वान, मर्मज्ञ, आचार्य, शास्त्रकार और धर्मावलम्बी आदि प्रबुद्ध आत्माएं मानते हैं कि भगवद्गीता नाम से प्रसिद्ध गीता तो वस्तुतः एक ही है। कालान्तर में कवि, रहस्यदर्शी, बौद्धिक शास्त्र विश्लेषक आदि ने अपने-अपने बुद्धि-विवेक से सैद्धान्तिक, भावनात्मक और व्यवहारिक दृष्टिकोण से अध्यात्म के समावेश की प्रेरणा देने और सद्मार्ग पर चलने के उदेश्य से अनेक गीताएं लिख दीं।
दूसरे शब्दों में कहें कि भगवद्गीता की लोकप्रियता और सरलता को देखते हुए विभिन्न शास्त्र पुराणों के अध्यात्म प्रसंगों को भी गीता के नाम से प्रसिद्ध कर दिया।
आचार्य श्री राम शर्मा जी के सद्साहित्य के अनुसार इस तरह की अड़तीस गीताएँ और भी हैं। सब गीताओं में किन्हीं शास्त्रों के अंश हैं। इनमें अधिकतर भागवत, महाभारत, रामायण और देवी भागवत के ही अंश हैं। परन्तु विद्वानों के अनुसार जिस रुप में गीता आज विद्यमान है, वह उसी रुप में उपदिष्ट हुई है।
भगवद्गीता के अलावा अन्य गीताओं के नाम इस प्रकार हैं।
उदाहरण के लिए भागवत पुराण से गोपिका गीता, भिक्षु गीता, भ्रमरगीता, पाराशर गीता और महाभारत से षड्ज गीता, पिंगला गीता, शंपाक गीता, नारगीता, भक्ति गीता, आजगर गीता, हारीत गीता, वृत्र गीता, पुत्र गीता, कामगीता प्रसिद्ध हैं। यमगीता के दो पाठ मिलते हैं, एक नृसिंह पुराण से और दूसरा अग्निमहापुराण से। ईश्वर गीता - कूर्मपुराण, हंसगीता - एक पाठ भागवत से और दूसरा महाभारत से। गणेश गीता - गणेश पुराण से और भगवती गीता - देवीभागवत से ली गई हैं। उत्तर गीता - संन्यास उपनिषद के नाम से भी प्रसिद्ध है। रामगीता - अध्यात्म रामायण और अद्भुत रामायण से उद्धृत हैं। जीवन्मुक्त गीता महर्षि विश्वामित्र की रची बताई जाती है। ब्रह्मगीता, गुरु गीता, हनुमद् गीता, कपिल गीता, विभीषण गीता, अष्टावक्र गीता, अवधूत गीता, वशिष्ट गीता, विचक्षु गीता और अनुगीता के नाम से भी योग और अध्यात्म के उपदेश विभिन्न स्रोतों से संकलित किए या लिखे गए हैं।            



गोपाल राजू (वैज्ञानिक)
.प्र. राजपत्रित अधिकारी

तैतीस करोड़ देवी-देवताओं का तार्किक सत्य

.प्र. राजपत्रित अधिकारी
30, सिविल लाईन्स
रूड़की - 247667 (उत्तराखण्ड)





हिन्दु धर्म में तैतीस करोड़ देवी-देवताओं की आस्था सर्व विदित है। यह कितनी सत्य अथवा तार्किक है, धर्म ग्रथों में यहाँ एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह लगता है। शास्त्रों में और विशेष रुप से वैदिक साहित्य में तैंतीस कोटि देवी-देवताओं का वर्णन मिलता है। इसके धर्म गुरुओं और अनेक बौद्धिक वर्ग ने दो प्रकार से अर्थ निकाले हैं जो वस्तुतः आधारित हैं कोटि शब्द के द्विभाषी अर्थ पर। कोटि शब्द का एक अर्थ करोड़ है और दूसरा प्रकार अर्थात श्रेणी भी। तार्किक दृष्टि से देखा जाए तो कोटि का दूसरा अर्थ इस विषय में अधिक सत्य प्रतीत होता है अर्थात तैंतीस प्रकार की श्रेणी या प्रकार के देवी-देवता।
परन्तु शब्द व्याख्या, अर्थ और सबसे ऊपर अपनी-अपनी समझ और बुद्धि के अनुरुप मान्यताए अलग-अलग हो गयीं। शब्द का अर्थ और अर्थ का अनर्थ कैसे हो जाता है- आप स्वयं मनन कर लें।
     कुंती शब्द से यदि बिंदु हट जाए तो वह कुती बन जाता है। रोको, मत जाने दो और रोको मत, जाने दो में एक अर्ध विराम के थोड़े से परिवर्तन के कारण अर्थ ही बदल गया है। बच्चे को बन्द रखा गया। यदि एक शब्द भी इधर से उधर हो जाए तो अनर्थ ही हो जाता है - बच्चे को बन्दर खा गया। आदि सैकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं। कुछ ऐसी ही भ्रम उत्पन्न हुआ है कोटि शब्द के अर्थ को लेकर।
     जीव से पहले प्रति का अस्तित्व था, यह-तर्क पूर्णतया वैज्ञानिक है। प्रति के कारण ही जीव अस्तित्व मे आया। जब जीव के मन में भय ने स्थान ग्रहण करना प्रारम्म किया तब वह प्रति से सुरक्षा के साधन तलाशने लगा। धीरे-धीरे बुद्धि के विकास के साथ-साथ यह समझ में आने लगा कि गंगा पावन है। गाय माँ तुल्म  हैं, उसमें तैंतीस कोटि देवी-देवताओं का वास है। पीपल, बड़, आँवला, तुलसी, केला आदि वनस्पति जीवन को अमृत्व प्रदान करती हैं, इसलिए आस्था जगने लगी कि यह अथवा इनके जैसी अन्य वनस्पती देव तुल्य हैं अथवा इनमें देवताओं का वास है। यही वस्तुतः मूल कारण रहा कि इन सबको धर्म और आस्था से जोड़ दिया गया। दूसरे अथरें में यह भी कहा जा सकता है कि जीव के पालन  और संरक्षण के कारण प्रकृति अर्थात देव रुप  इस अनंत, अनल, अविनाशी, दुःखहर्ता,  सुख कर्ता श्रेष्ठ आदि और आप जो कुछ भी कल्पना कर सकते हैं, को देवी-देवताओं से जोड़ दिया गया और अपने- अपने बुद्वि-विवेक से उसकी पूजा अर्चना की जाने लगी।
     वैदिक व्याख्या के परिपेक्ष्य में देखा जाय तो तैंतीस करोड़ देवी देवताओं की बात मिथ्या लगती है। समस्त सृष्टि के पालक और संरक्षक के रुप में प्रत्येक पदार्थ, जीव, वनस्पती आदि को तैंतीस रुपों में प्रस्तुत किया गया जिसका वर्गीकरण निम्न प्रकार से स्पष्ट है -
8 वसु - जितने भी पदार्थ हैं वह सब वसु में है। सबके निवास स्थान होने के कारण यह वसु कहे गए। आठ वसु है अग्नि, पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्यौः, चन्द्रमा और नक्षत्र। वसु के अन्य आठ नाम भी हैं। यह हैं - धर, धुर्व, सोम अह, अनिल, अनल  प्रत्युष और प्रभाष।
11 रुद्र - दस प्राण और एक आत्मा से मिलकर शरीर की रचना होती है। शरीर के दस प्राण हैं - प्राण, अपान, व्यान, उदान, नाग, कुर्भ, कल, देवदत्त, धनज्ज्य, अनल और ग्यारहवाँ है जीवात्मा। जीवात्मा के शरीर छोड़ने के बाद पार्थिव शरीर को लेकर इष्ट-मित्र, सगे-सम्बन्धी आदि शोक करके रुदन करते हैं, चिल्लाते हैं। सम्भवतः इसीलिए इसका नाम रुद्र हुआ। रुद्र के अन्य नाम हैं - हर, बहुरुप, त्र्यम्बक, अपराजिता, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, म्रग्व्यध और र्श्व।
12 आदित्य - प्रत्येक पदार्थ की आयु ग्रहण करने के कारण इनको आदित्य कहा गया। धाता, मित, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान, पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु यह बारह आदित्य कहे गए हैं।
2 अश्विनी - एक इन्द्र और एक प्रजापति।    
इस प्रकार 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य और 2 अश्विनी मिलाकर कुल बनते है 33 और यही संख्या तार्किक लगती है। अपने दिव्य गुणों के कारण से ही यह तैसीस देव कहलाते हैं।
  
              

मानसश्री गोपाल राजू (वैज्ञानिक)
.प्र. राजपत्रित अधिकारी
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